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आज है कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार , जानिए कैसे और क्यों मनाई जाती है कृष्ण जन्माष्टमी

कृष्ण जन्माष्टमी

जन्माष्टमी अर्थात कृष्ण जन्मोत्सव इस वर्ष जन्माष्टमी का त्यौहार 25 अगस्त गुरुवार को मनाया जाएगा। जन्माष्टमी जिसके आगमन से पहले ही उसकी तैयारियां जोर-शोर से आरंभ हो जाती हैं। पूरे भारत वर्ष में इस त्यौहार का उत्साह देखने योग्य होता है। चारों ओर का वातावरण भगवान श्रीकृष्ण के रंग में डूबा हुआ होता है। जन्माष्टमी पूर्ण आस्था एवं श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने पृथ्वी को पापियों से मुक्त करने हेतु कृष्ण रूप में अवतार लिया, भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी और वासुदेव के पुत्ररूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। जन्माष्टमी को स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग अपने अनुसार अलग-अलग ढंग से मनाते हैं।

श्रीमदभागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं तथा वैष्णव मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी का त्योहार मनाते हैं।

जन्माष्टमी के विभिन्न रंग रूप- यह त्यौहार विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं फूलों और इत्र की सुगंध का उत्सव होता है तो कहीं दही हांडी फोड़ने का जोश और कहीं इस मौके पर भगवान कृष्ण के जीवन की मोहक छवियां देखने को मिलती हैं। मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है। भक्त इस अवसर पर व्रत एवं उपवास का पालन करते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है तथा कृष्ण रासलीलाओं का आयोजन होता है।

जन्माष्टमी के शुभ अवसर के समय भगवान कृष्ण के दर्शनों के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। मथुरा के सभी मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों व फूलों से सजाया जाता है। मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित होने वाले श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को देखने के लिए देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त पंहुचते हैं। भगवान के विग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढ़ाकर लोग उसका एक दूसरे पर छिड़काव करते है। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं तथा भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन किया जाता है।

जन्माष्टमी व्रत पूजा विधि- शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत का पालन करने से भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। श्रीकृष्ण की पूजा आराधना का यह पावन पर्व सभी को कृ ष्ण भक्ति से परिपूर्ण कर देता है। यह व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना जाता है। इस दिन उपवास रखे जाते हैं तथा कृष्ण भक्ति के गीतों का श्रवण कि या जाता है। घर के पूजागृह तथा मंदिरों में श्रीकृष्ण-लीला की झांकियां सजाई जाती हैं।

जन्माष्टमी पर्व के दिन प्रात:काल उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र नदियों में, पोखरों में या घर पर ही स्नान इत्यादि करके जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लिया जाता है। पंचामृत व गंगा जल से माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी की मूर्ति या चित्र पालने में स्थापित करते हैं तथा भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को नए वस्त्र धारण कराते हैं। बालगोपाल की प्रतिमा को पालने में बिठाते हैं तथा सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करते है। पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नामों का उच्चारण करते हैं तथा उनकी मूर्तियां भी स्थापित करके पूजन करते हैं।

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