जैन धर्म

श्री अजितनाथ जी

जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ जी हैं। अजितनाथ जी का जन्म पवित्र नगरी अयोध्या के राजपरिवार में माघ के शुक्ल पक्ष की अष्टमी में हुआ था। इनके पिता का नाम जितशत्रु और माता का नाम विजया था। प्रभु अजितनाथ का चिह्न हाथी था।

जीवन परिचय :

अजितनाथ जन्म से ही वैरागी थे, लेकिन पिता की आज्ञानुसार उन्होंने पारिवारिक जीवन और राज्य का दायित्वों का भी वहन किया। कालान्तर में अपने चचेरे भाई को राज पाठ का भार सौंपकर अजितनाथ जी ने प्रवज्या ग्रहण की। माघ शुक्ल नवमी के दिन उन्होंने दीक्षा प्राप्त की। इसके पश्चात बारह वर्षों की कड़ी साधना कर अजितनाथ जी को “केवल ज्ञान” की प्राप्ति हुई थी। धर्म तीर्थ की रचना कर तीर्थंकर पद पर विराजमान हुए। जैन मान्यतानुसार चैत्र मास की शुक्ल पंचमी के दिन ‘सम्मेद शिखर’ (सममेट शिखर) पर प्रभु अजितनाथ जी को निर्वाण प्राप्त हुआ।

चिह्न का महत्त्व :

भगवान अजितनाथ जी का चिह्न हाथी है, जो बुद्धिमान व शक्तिशाली प्राणी माना जाता है। हाथी युद्ध के मैदान में आगे रहकर दुश्मनों को परास्त करता है, और हमें संदेश देता है कि जीवन संग्राम में आगे रहकर कठिनाइयों को पराजित कर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

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